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Chhath Puja 2019 Date and Time, Puja Vidhi, Shubh Muhurat:

Chhath Puja 2019 Date and Time, Puja Vidhi, Shubh Muhurat
कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को छठ पर्व मनाया जाता है। यह त्योहार विशेष रूप से पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में मनाया जाता है। इस दिन सूर्यदेव की विशेष पूजा की जाती है। छठ पूजा के दौरान, 36 घंटे तक व्रत रखा जाता है और अर्घ्य की स्थापना सूर्य और उगते सूर्य को अर्पित की जाती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, छठ सूर्य देव की बहन है। जानिए छठ पर्व का इतिहास और महत्व …

छठ पूजा का इतिहास : छठ केवल एक त्योहार ही नहीं बल्कि एक महापर्व है जो 4 दिनों तक चलता है। इसके परिचय के बारे में कई कहानियां प्रचलित हैं।

छठ पूजा का इतिहास : छठ एक पर्व ही नहीं बल्कि महापर्व है जो 4 दिनों तक चलता है। इसकी शुरुआत को लेकर कई कहानियां मिलती हैं।

Chhath Puja 2019 Date and Time, Puja Vidhi, Shubh Muhurat:
Chhath Puja 2019 Date and Time, Puja Vidhi, Shubh Muhurat:
  • एक पौराणिक कथा के अनुसार, महाभारत काल में, जब पांडव जुए में अपनी सारी रॉयल्टी हार गए, तब द्रौपदी ने छठ व्रत किया। जिसने उनकी सभी इच्छाओं को पूरा किया और पांडवों को राजपाट वापस मिल गया।
  • इसके अलावा, छठ महापर्व का उल्लेख रामायण काल में भी मिलता है। ऐसा माना जाता है कि छठ या सूर्य पूजा महाभारत काल से की जाती है।
  • ऐसा कहा जाता है कि छठ पूजा की शुरुआत सूर्य पुत्र कर्ण ने की थी। विश्वासियों के अनुसार, वे प्रतिदिन घंटों तक कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे। वह सूर्य की कृपा से एक महान संत बने।
  • एक पौराणिक कथा के अनुसार, जब महाभारत काल में पांडव जुए में अपनी सारी रॉयल्टी हार गए थे, तब द्रौपदी ने छठ व्रत किया था। जिसने उनकी सभी इच्छाओं को पूरा किया और पंडों को राजपाट वापस मिल गया।
  • भले ही छठ पूजा का त्योहार कार्तिक शुक्ल षष्ठी को मनाया जाता है, लेकिन इसकी शुरुआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी पर नहाय खाय के साथ होती है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन व्रत, स्नान आदि करते हैं, नए कपड़े पहनते हैं और शाकाहारी भोजन ग्रहण करते हैं। घर के बाकी सदस्य उपवास के भोजन के बाद ही भोजन करते हैं।
  • कार्तिक शुक्ल पंचमी को पूरे दिन उपवास रखा जाता है और शाम को वे फास्ट फूड लेते हैं। इसे खरना कहा जाता है। इस दिन अन्न और जल का सेवन किए बिना उपवास किया जाता है। शाम को चावल और गुड़ से बनी खीर खाई जाती है।
  • षष्ठी के दिन छठ पूजा का प्रसाद बनाया जाता है। इसमें ठकुआ खास है। कुछ जगहों पर इसे टिकरी भी कहा जाता है। चावल के लड्डू भी बनाए जाते हैं। प्रसाद और फलों को बांस की टोकरियों में सजाया जाता है। टोकरी की पूजा करके सभी व्रती सूर्य को अर्घ्य देने के लिए तालाब, नदी या घाट आदि पर जाते हैं। डूबते सूर्य की पूजा करने के लिए स्नान किया जाता है।
  • सूर्यास्त पूजा की प्रक्रिया अगले दिन यानी सप्तमी को सुबह सूर्योदय के समय भी दोहराई जाती है। छठ पूजा विधिवत पूजा और प्रसाद वितरण करके की जाती है।
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(Chhath Maiya Ka Pooja Mantr) छठ मइया का पूजा मंत्र

ॐ सूर्य देवं नमस्ते स्तु गृहाणं करूणा करं ।।
अर्घ्यं च फ़लं संयुक्त गन्ध माल्याक्षतै युतम् ।।

छठी मइया का प्रसाद (chhathee maiya ka prasaad) – ठेकुआ, मालपुआ, खीर, खजूर, चावल का लड्डू और सूजी का हलवा आदि छठ मइया को प्रसाद के रूप में चढ़ाया जाता है।

कर्ण ने भी की थी सूर्य की पूजा

पौराणिक मान्‍यताओं के अनुसार, छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी। सबसे पहले सूर्यपुत्र कर्ण ने सूर्य देव की पूजा शुरू की। कर्ण भगवान सूर्य के परम भक्त थे। वह प्रतिदिन घंटों कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे। सूर्य की कृपा से ही वह महान योद्धा बने। आज भी छठ में अर्घ्य दान की यही परंपरा प्रचलित है।

कर्ण ने भी की थी सूर्य की पूजा

षष्ठांशां प्रकृते: शुद्धां सुप्रतिष्ठाण्च सुव्रताम्।।
सुपुत्रदां च शुभदां दयारूपां जगत्प्रसूम्।।
श्वेतचम्पकवर्णाभां रत्नभूषणभूषिताम्।पवित्ररुपां परमां देवसेनां परां भजे।।

बिहार में छठ पर्व स्थानिकता से जुड़ी है

छठ पर्व मुख्यतः बिहारवासियों का पर्व है। इसके साथ ही बिहार से सटे नेपाल तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश में भी इसे मनाया जाता है। बिहार में इसे मनाये जाने का मुख्य कारण है इसकी स्थानिकता। इससे जुड़ी एक कथा भी है। कथा इस प्रकार है- एक बार शिव भक्त माली और सोमाली सूर्य की तरफ जा रहे थे। यह बात सूर्य को नागवार लगी और सूर्य ने शिवभक्तों को जलाना शुरू किया। उन्होंने शिव जी से शिकायत की जिसपर शिव ने सूर्य पर त्रिशूल से प्रहार कर उसे खंडित कर दिया। सूर्य के तीन टुकड़े पृथ्वी पर तीन स्थानों पर गिरे , वे तीन स्थान हैं, देवार्क ( बिहार में देव नामक स्थान में) , कोणार्क ( ओड़िसा) और लोलार्क ( काशी)। चूंकि देव का मंदिर पश्चिमाभिमुख और यही एकमात्र मंदिर है जिसमें मुख्या प्रतिमा पश्चिमाभिमुख है। बाद में उससे अन्य पौराणिक साक्ष्य जुड़ गए। इसीलिए अस्ताचल गामी सूर्य की पूजा यहीं से शुरू हुई। बाद में अन्य स्थानों में भी होने लगी।

कोसी

षष्ठी के दिन शाम को डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा। इस दौरान पांच गन्ने को छत्रनुमा आकार के साथ पानी के भीतर खड़ा किया जाता है। गन्ने की ये पांच छड़ें पांच प्राकृतिक तत्वों पृथ्वी, अग्नि, आकाश, जल और वायु को दर्शाते हैं। वहीं कुछ लोग कोसी भी भरते हैं जिनके यहां किसी बच्चे ने जन्म लिया हो या फिर शादी हुई हो। इस प्रक्रिया को व्रती घर के आंगन या फिर छत पर करते हैं और उसके बाद नदी के तट पर इसे पुनः किया जाता है। इस दौरान मिट्टी के दीए जलाए जाते हैं जो ऊर्जा के प्रतीक के तौर पर देखा जाता है।

इन पांच फलों को सूप में जरूर रखें

Chhath Puja 2019 Date and Time, Puja Vidhi, Shubh Muhurat:
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छठ पर्व में ये फल सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण माने जाते हैं। डाभ नींबू- डाभ नींबू आकार में थोड़ा बड़ा होता है जिसके छिलके काफी मोटे होते हैं। रंग पीला ही होता है। इसे पवित्र फल माना जाता है। दूसरा फल के रूप में केला आता है। इस पर्व में कच्चे केले का इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे करने से इसकी पवित्रता बरकरार रहती है। तीसरा फल होता है गन्ना, गन्ने को समृद्धि का प्रतीका माना जाता है। छठ पर इसे चढ़ाना शुभ माना जाता है। चौथे फल के रूप में सुपारी आता है। सुपारी भी इस पर्व पर चढ़ाए जाने वाले फलों में खास महत्व रखता है। सख्त होने से इस फल को पक्षी जूठा नहीं कर सकता इसलिए इसे चढ़ाया जाता है। वहीं पांचवें फल जिसे कोसी में रखा जाता है वह है सिंघाड़ा। सिंघाड़ा को रोगनाशक माना जाता है यह फल पानी में ही फलता है लिहाजा इसे पवित्र फल में शामिल किया जाता है। यही कारण है कि इसे छठी माई के प्रसाद स्वरूप इस्तेमाल किया जाता है।

छठ व्रत के पारण की विधि :

सप्तमी के दिन सूर्योदय से पहले ब्रह्म मुहूर्त में सारे व्रती घाट पर पहुंच जाते हैं।
इस दौरान पकवानों की टोकरियों, नारियल और फलों को साथ में ध्यान से ले जाएं।
सभी व्रती उगते सूरज को डाल पकड़कर अर्घ्य दें।- छठी की कथा सुनें और प्रसाद का वितरण करें।
आखिर में सारे व्रती प्रसाद ग्रहण कर व्रत खोलें।

छठी मईया की पूजा विधि (Chhath Puja Vidhi) :

नहाय-खाय के दिन व्रती सिर्फ शुद्ध आहार का सेवन करते हैं और खरना या लोहंडा के दिन शाम के समय गुड़ की खीर और पूरी बनाकर छठी माता को भोग लगाया जाता है। खरना पूजा आज है। सबसे पहले इस खीर को व्रती खुद खाएं बाद में परिवार और ब्राह्मणों को दें। छठ के दिन छठी मैया का प्रसाद तैयार किया जाता है। घर में बने हुए पकवानों को बड़ी टोकरी में भरकर लोग घाट पर ले जाते हैं। घाट पर ईख का घर बनाकर एक बड़ा दीपक जलाया जाता है। व्रती घाट में स्नान कर के लिए उतरें और दोनों हाथों में डाल को लेकर भगवान सूर्य को अर्घ्य दें। सूर्यास्त के बाद घर जाकर परिवार के साथ रात को सूर्य देवता का ध्यान और जागरण किया जाता है। इस जागरण में छठी मइया के गीतों (Chhathi Maiya Geet) को सुना जाता है।

व्रत के दौरान बरतें ये सावधानियां :

भले ही घर के सभी लोग छठ का व्रत न रख रहे हों, लेकिन अगर घर में किसी एक ने भी व्रत रखा है, तो पूरे परिवार को तामसिक भोजन से परहेज करने होते हैं। पूरे परिवार को सात्विकता और स्वच्छता का पालन करना होता है। छठ को अत्यंत सफाई और सात्विकता का व्रत माना जाता है। इसलिए इसमें सबसे बड़ी सावधानी यही मानी जाती है कि इस दौरान साफ-सफाई का खास ख्‍याल रखा जाना चाहिए।

छठ पूजा की सामग्री लिस्ट (Chhath Puja Samagri List) :

प्रसाद के लिए बांस की तीन टोकरी, बांस या, पीतल के तीन सूप, लोटा, थाली, गिलास, नारियल, साड़ी-कुर्ता पजामा, गन्ना पत्तों के साथ, हल्दी अदरक हरा पौधा, सुथनी, शकरकंदी, डगरा, हल्दी और अदरक का पौधा, नाशपाती, नींबू बड़ा, शहद की डिब्बी, पान सुपारी, कैराव, सिंदूर, कपूर, कुमकुम, अक्षत के लिए चावल, चन्दन, ठेकुआ, मालपुआ, खीर-पूड़ी, खजूर, सूजी का हलवा, चावल का बना लड्डू/लड्डुआ, सेब, सिंघाड़ा, मूली।

छठ पर्व का इतिहास (Chhath Puja History) :

पौराणिक कथाओं के अनुसार 14 सालों तक वनवास के बाद जब भगवान राम अयोध्या लौटे थे तो रावण वध के पाप से मुक्त होने के लिए ऋषि-मुनियों ने उन्हें राजसूय यज्ञ करने को कहा। इस यज्ञ के लिए मुग्दल ऋषि को आमंत्रण दिया गया था, लेकिन मुग्दल ऋषि ने भगवान राम एवं सीता को अपने ही आश्रम में आने का आदेश दिया। ऋषि की आज्ञा पर भगवान राम एवं सीता स्वयं यहां आए और उन्हें इसकी पूजा के बारे में बताया गया। मुग्दल ऋषि ने मां सीता को कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष षष्ठी तिथि को सूर्यदेव की उपासना करने का आदेश दिया। यहीं रह कर माता सीता ने छह दिनों तक सूर्यदेव भगवान की पूजा की थी।

छठ पूजा के दौरान व्रतियों के लिए नियम (Chhath Puja Vrat Niyam)

1. व्रती छठ पूजा के दौरान नए कपड़े पहनें। 2. छठ पूजा के चारों दिन व्रती जमीन पर चटाई पर सोएं।3. व्रती के साथ-साथ घर के बाकी सदस्य भी छठ पूजा के दौरान प्याज, लहसुन और मांस-मछली का सेवन न करें।4. पूजा के लिए बांस से बने सूप और टोकरी का इस्तेमाल करें।5. छठ पूजा में गुड़ और गेंहू के आटे के ठेकुआ, फलों में केला और गन्ना ध्यान से रखें।

खरना पूजा (Kharna Puja ) :

क्या होता है खरना- सूर्य उपासना का यह लोकपर्व छठ 4 दिनों तक मनाया जाता है। जिसके दूसरे दिन खरना किया जाता है। खरना का मतलब होता है शुद्धिकरण। दरअसल, छठ का व्रत करने वाले व्रती नहाय खाय के दिन पूरा दिन उपवास रखकर केवल एक ही समय भोजन करके अपने शरीर से लेकर मन तक को शुद्ध करने का प्रयास करते हैं। जिसकी पूर्णता अगले दिन होती है। यही वजह है कि इसे खरना के नाम से बुलाया जाता है। इस दिन व्रती साफ मन से अपने कुलदेवता और छठ मैय्या की पूजा करके उन्हें गुड़ से बनी खीर का प्रसाद चढ़ाते हैं। आज के दिन शाम होने पर गन्ने का जूस या गुड़ के चावल या गुड़ की खीर का प्रसाद बना कर बांटा जाता है। प्रसाद ग्रहण करने के बाद व्रतियों का 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू हो जाता है।

छठ पूजा की कथा (Chhath Puja Katha) :

छठ पूजा के पीछे की एक कहानी राजा प्रियंवद को लेकर भी है। कहते हैं राजा प्रियंवद को कोई संतान नहीं थी तब महर्षि कश्यप ने पुत्र की प्राप्ति के लिए यज्ञ कराकर प्रियंवद की पत्नी मालिनी को आहुति के लिए बनाई गई खीर दी। इससे उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई लेकिन वो पुत्र मरा हुआ पैदा हुआ। प्रियंवद पुत्र वियोग में श्मशान पर अपने प्राण त्यागने लगे। उसी वक्त भगवान की मानस पुत्री देवसेना प्रकट हुईं और उन्होंने राजा से कहा कि क्योंकि वो सृष्टि की मूल प्रवृति के छठे अंश से उत्पन्न हुई हैं, इसी कारण वो षष्ठी कहलातीं हैं। उन्होंने राजा को उनकी पूजा करने और दूसरों को पूजा के लिए प्रेरित करने को कहा। राजा प्रियंवद ने पुत्र इच्छा के कारण देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई।
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