Ambedkar Jayanti

डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर की जीवनी | Dr Bhimrao Ambedkar Ki Jeevan Gatha |

डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर की जीवनी ( Dr Bhimrao Ambedkar Ki Jeevan Gatha )

डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर भारतीय संविधान के निर्माता और आज़ाद भारत के पहले न्याय मंत्री थे । वे दलितों के मसीहा और महान समाज सुधारक थे । उन्होंने समाज में दलितों के विरुद्ध व्याप्त बुराईओं और उनके उत्थान के लिए महत्वपूर्ण कार्य किया और अपना सम्पूर्ण जीवन उनकी सेवा में समर्पित कर दिया ।
भीमराव अंबेडकर ने दलितों के हक की लड़ाई लड़ी और देश की सामाजिक स्थिति में काफी सुधार किया ।भारतीय संविधान के निर्माता बाबा साहब अम्बेडकर केवल दलितों के ही नेता नही थे ,वह एक ऐसे राष्ट्रपुरुष थे जिन्होंने समूचे देश के संबंध में भारत के समाज के बारे में और इसके इतिहास के बारे में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
बाबा साहब एक सच्चे समाज सुधारक ,शिक्षाशास्त्री ,विद्वान लेखक , विदिवेत्ता ,दलितों के मसीहा और राजनयिक थे ।उन्होंने समाज में दलितों और नीची जाति के लोगो उद्धार के लिए जो संघर्ष किया उसे कभी भी भुलाया नही जा सकता है । महाराष्ट्र में अपनी वीरता , पराक्रम और ईमानदारी के लिए प्रसिद्ध ,प्रभावशाली ,और अछूत कहलाये जानी वाली महार जाती में उन्होंने जन्म लिया था ।
निम्न वर्ग से संबंधित होने के कारण इनको काफी हद तक सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ा और इसलिए उन्हें अपनी पढ़ाई के लिए भी काफी हद तक संघर्ष करना पड़ा लेकिन इन सबसे हार न मानते हुए उन्होंने उच्च शिक्षा हासिल की और दुनिया के सामने खुद को साबित किया ।

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Bhim status

प्रारंभिक जीवन

डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर जी का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में स्थित महू में हुआ था । इनके पिता का नाम रामजी मालोजी सकपाल और माता का नाम भीमाबाई था । अम्बेडकर जी के जन्म के समय इनके पिता भारतीय सेना में सूबेदार थे और इनकी पोस्टिंग इंदौर में थी । 3 साल बाद 1894 में इनके पिता रिटायर हो गए और उनका पूरा परिवार महाराष्ट्र के सतारा में जा के बस गया ये अपनी माता पिता के सबसे छोटे संतान थे ।
इसलिए पूरे परिवार में लोग इनको सबसे अधिक प्रेम करते थे ।भीमराव अंबेडकर महार जाती यानी एक दलित परिवार से संबंध रखते थे । जिसकी वजह से उनके साथ सामाजिक और आर्थिक रूप से गहरा भेदभाव किया जाता था ।
भीमराव के दादा मालोजी सेना में हवलदार के पद तक पहुचे थे । भीमराव के परिवार में लड़के -लड़कियों के लिए दिन में कक्षाएं चलती थी उम्रदराज लोगो के लिए रात्रि में कक्षाएं चलती थी।इसी विद्यालय में रामजी सूबेदार का प्रधानाचार्य के पद पर नियुक्ति हुई और मुबड़कर ने अपनी पुत्री भीमाबाई का विवाह रामजी के साथ करवा दिया।
भीमाबाई एक उच्च घराने से ताल्लुकात रखती थी उनके परिवार में सभी सुख सुविधाएं उपलब्ध थी और उन्हें अपने पिता के घर किसी भी प्रकार की कोई कमी कभी भी महसूस नही हुई थी किन्तु उनके पति रामजी को पुणे शहर में शिक्षक का काम करते समय बहुत ही काम वेतन मिलता था और इसी वेतन में उन्हें अपना भी खर्च निकलना होता था और अपनी पत्नी को भी देना होता था । उनके द्वारा जो पैसे मिलते थे उसी में भीमाबाई को गुजर करना पड़ता था ।
इस प्रकार भीमाबाई को बहुत समझौते की ज़िंदगी व्यतीत करनी पड़ी।बाबा साहब अम्बेडकर का जन्म एक ऐसे जति में हुआ था जिसकी गिनती समाज में बहुत ही निम्न वर्ग में होती थी वे एक महार जाती से संबंध रखते थे इसे अछूत जाती मन जाता था जिसके कारण उन्हें समाज में सामाजिक बहिष्कार , अपमान , और भेदभाव का सामना करना पड़ा
उनका बचपन बहुत ही मुश्किलों में बीता उन्हें स्कूल में भी शिक्षको द्वारा भेदभाव का सामना करना पड़ा, शिक्षक उनके ऊपर ध्यान नही देते थे और स्कूल के अन्य विद्यार्थी नाही उनके साथ खाना खाते और न खेलने जाते , उन्हें पानी के बर्तन को भी छूने का अधिकार नही था ऐसा कहा जाता है कि स्कूल का चपरासी उन्हें पानी पिलाता था और जिस दिन चपरासी नही आता था वह पानी पीने से वंचित राह जाते थे। ।
बाबा साहब के पिता भारतीय सेना में सूबेदार थे ,भीमराव अपने माता पिता की सबसे छोटी संतान थे वे 14 भाई बहनों में सबसे छोटे थे उनके पिता का 1894 में सतारा स्थानांतरण हो गया जिससे उनका पूरा परिवार सतारा में रहने लगा और कुछ समय बाद 1896 में उनकी माता का निधन हो गया , जिससे उनका पालन पोषण उनकी बुआ ने किया इस दौरान उनको बहुत सी आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ा ।
समय बीतता गया और उनके पिता ने अपने बच्चों की देखभाल के लिए दूसरी शादी करने का मन बनाया और अंततः 4 वर्ष बाद उन्होंने दूसरी शादी कर लिया और उनका पूरा परिवार मुम्बई में शिफ्ट हो गया। पिता के सेना में होने कारण अम्बेडकर जी को पढ़ाई करने का पूरा फायदा मिला ।
बाबा साहब जी का पूरा ध्यान मुख्य रूप से दलितों और अन्य नीची जातियों के सामाजिक और राजनीतिक अधिकारों को प्राप्त करने में था भारत की आज़ादी के बाद वे प्रमुख रूप से अछूतों और दलितों के नायक के रूप में उभरे । दलित बौद्ध आंदोलन भारत मे बाबा साहब के नेतृत्व में दलितों के हित में किया गया किया गया एक आंदोलन था ।
इस आंदोलन के परिणामस्वरूप 5 लाख दलित उनके साथ सम्मिलित हुए और अपने आपको पूर्ण रूप से बौद्ध धर्म में परिवर्तित कर लिए यह आंदोलन बौद्ध धर्म की राजनीतिक और सामाजिक पहल से जुड़ा हुआ था जिसमें बौद्ध धर्म के विचारों और उसकी गहराईओं के बारे में व्याख्या की गई ।
डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने सामूहिक रूप से हिन्दू धर्म और यहां की जाति व्यवस्था का अनुसरण करने से इनकार कर दिया उन्होंने समाज मे नीचे श्रेणी के लोगो और दलितों के अधिकारों को बढ़ावा दिया ।
उन्होंने कहा यदि हम हिन्दू धर्म और जाति व्यवस्था को अपनाएंगे तो इस समाज मे दलितों और निम्न जातियों को शोषण सहन पड़ेगा ।तो भलाई इसी में है कि हम बौद्ध धर्म के विचारों को अपनाए जिससे समाज मे दलितों और नीची जातियों को भी सामाजिक और राजनीतिक रूप से सामान अधिकार प्राप्त हो सके और वो लोग भी समाज मे सर उठा के और बिना किसी शोषण के रह सके।
समाज मे बौद्ध धर्म बारे में कई लेख और किताबें प्रकशित होने के कारण लोगों को बौद्ध धर्म के विचारो के बारे में अच्छे से ज्ञान हो गया था और लोग अच्छे तरीके से जान गए थे यदि हमे अपने सामाजिक और राजनीतिक जीवन मे सुधार लाना है और हम लोगो को समाज मे गर्व से जीना है तो इसका एकमात्र साधन है कि हम लोग बौद्ध धर्म को अपना लें ।
बौद्ध धर्म को अपनाने के पश्चात दलितों में एक नई ऊर्जा का संचार हुआ और उन्हें समाज मे खुद को परिभाषित करने और अपनी पहचान बनाने की शक्ति प्राप्त हुई। अंबेडकर जी का यह धर्म परिवर्तन कोई क्रोध में लिया गया फैसला नहीं था ।
यह समाज मे दलितों और नीची जातियों के हित में लिया गया एक महत्वपूर्ण और हितकारी फसल था ,और हिन्दू धर्म का पूर्ण रूप से बहिष्कार था और निचले दर्जे पर होने वाले अत्याचारों और प्रभुत्व को चिन्हित करना था। बाबा साहब के अनुसार बौद्ध धर्म को अपनाकर मनुष्य अपने आप को आंतरिक रूप से सुधार करके अपने जीवन को सही कार्यो में लगा सकता है । उनका दृढ़ विश्वास इस बात पर आधारित था कि ये धार्मिक परिवर्तन देश के शोषित और निचले वर्ग के राजनैतिक और सामाजिक जीवन मे सुधार लाने में सफल रहा है।

जानिए संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर से जुड़ी 10 बातें Jai Bhim Status 2020
जानिए संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर से जुड़ी 10 बातें Jai Bhim Status 2020

प्रारंभिक शिक्षा (Primary education)

भीमराव अंबेडकर की प्रारंभिक शिक्षा दापोली में सतारा से हुयी इसके बाद इन्होंने हाईस्कूल के लिए बॉम्बे में एलफिंस्टोन हाईस्कूल में एडमिशन लिया । 1907 में उन्होंने मैट्रिक की डिग्री ली ।अम्बेडकर जी बचपन से ही पढ़ाई में खासी रुचि रखते थे और वे एक प्रतिभावान और तेज़ दिमाग वाले विद्यार्थी थे इसलिए वे अपनी हर परीक्षा अच्छे अंक से उत्तीर्ण होते थे ।
उन्होंने 1912 में मुम्बई विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन उत्तीर्ण किया उन्होंने अपना स्नातक अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान में उत्तीर्ण किया ।भीमराव अंबेडकर की प्रतिभा से प्रभावित होकर उनके शिक्षक श्री कृष्णा जी अर्जुन केलुस्कर ने स्वयं द्वारा लिखी गयी पुस्तक ‘बुद्ध चरित्र’ उपहार स्वरूप दिया ।
बाबा साहब अम्बेडकर बचपन में ही अच्छी शिक्षा प्राप्त करने में भाग्यशाली रहे क्योंकि उनके पिता ब्रिटिश सेना में सूबेदार के पद पर कार्यरत थे। पिता की नौकरी पूरा होने के बाद भी बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने अपना अध्ययन जारी रखा । अध्ययन पूरा होने के बाद उनको बड़ौदा में नौकरी मिल गयी ।
कुछ समय बाद उन्होंने अपने आगे की पढ़ाई के बारे में सोचना शुरू किया तो उन्हें लगा कि उन्हें उच्च शिक्षा के लिए विलायत जाना चाहिए तो वह आगे की पढ़ाई के लिए 1913 में संयुक्त राज्य अमेरिका चले गए । भीमराव बाबा साहब अम्बेडकर कोलंबिया विश्वविद्यालय से 1916 में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त करने वाले पहले भारतीय बन गए ।
कुछ समय बाद बाबा साहब जब अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद अमेरिका से वापस आये तो बड़ौदा के महाराजा ने अपने राजनीतिक सचिव के रूप में उन्हें नियुक्त किया। बाबा साहब भीमराव अंबेडकर 1917 में मुम्बई चले गए और 1920 में एक अखबार मूकनायक की स्थापना किया। बाबा साहब भीमराव अंबेडकर 9 भाषाओं के जानकार थे उन्होंने 21 साल की उम्र तक सभी धर्मों की पढ़ाई कर ली थी ।
अम्बेडकर जी के पास कुल 32 डिग्रियां थी। वो विदेश जाकर अर्थशास्त्र में पीएचडी करने वाले प्रथम भारतीय थे । ऐसा ज्ञात है कि भारत लौटने के पश्चात बड़ौदा के राजा के द्वारा पढ़ाई के लिए दी जाने वाली छात्रवृत्ति की शर्त के अनुसार उन्होंने बड़ौदा नरेश के दरबार मे सैनिक अधिकारी व वित्तीय सलाहकार का पद स्वीकार किया ।
इस दौरान जब वह रहने के लिए अपने लिए कमरा खोज रहे थे तो पूरे शहर में कोई भी उन्हें कमरा देने के लिए तैयार नही था इसलिए वह कुछ सप्ताह के बाद वह वापस मुम्बई चले गए इसके बाद उन्होंने परेल में दबक चल और श्रमिक कालोनी में रहकर अपनी अधूरी पढ़ाई पूरी करने की सोचा, परंतु इसके लिए उनके समक्ष वित्तीय समस्याएं आ रही थी इसलिए उन्होंने पार्ट टाइम अध्यापन व वकालत करके अपनी अधूरी पढ़ाई को पूरा किया ।
डॉक्टर अम्बेडकर ने सन् 1919 में राजनीतिक सुधार हेतु गठित साउथबरो आयोग के सम्मुख राजनीति में दलित प्रतिनिधित्व के पक्ष में साक्ष्य दी । डॉक्टर भीमराव अंबेडकर को समझ आया कि समाज में नीची जातियों , दलितों , निर्धन और अशिक्षित लोगो की स्थिति काफी निराशाजनक है इसलिए उन्होंने इन लोगों की स्थिति में सुधार लाने और इनको जागरूक बनाने के उद्देश्य से मूकनायक और बहिष्कृत भारत साप्ताहिक पत्रिकाएं संपादित की ।
इसके पश्चात वह अपनी अधूरी पढ़ाई के लिए जर्मनी और लंदन जैसे बड़े और पढ़ाई की दृष्टि से उपयुक्त देश मे गए और उन्होंने वहां से M.sc , D.llb और बैरिस्टर की उपाधियाँ प्राप्त की । बाबा साहब मबेडकर की और उच्च शिक्षा की ओर देखा जाय तो उन्हें L.L.D की उपाधि कोलंबिया विश्वविद्यालय ने और डी .लिट की मानद उपाधि उस्मानिया विश्वविद्यालय ने दिया ।अंततः बाबा साहब भीमराव अंबेडकर सामाजिक बुराईयों का सामना करते हुए B.A , M.A , M.SC, P.HD , बैरिस्टर , D.SC , D.LITT आदि की कुल 32 डिग्रियां हासिल की।
बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के पास जो इतना ज्ञान और इतनी डिग्रियां थी उसका उपयोग उन्होंने समाज में दलितों, निर्धनों , व नीची जातियों के सामाजिक व आर्थिक जीवन मे सुधार लाने में उपयोग किया । बाबा साहब ने अपने सम्पूर्ण जीवनकाल में देश को सामाजिक , राजनीतिक , धार्मिक , ऐतिहासिक , सांस्कृतिक , औद्योगिक , आर्थिक आदि विभिन्न क्षेत्रों में प्रभावी कार्य करते हुए राष्ट्र निर्माण में अतुल्यनीय योगदान दिया। बाबा साहब ने सामाजिक कुरीतियों जैसे जात – पात, ऊंच – नीच , छुआ – छूत , नीची जातियों व दलितों का मंदिरों में प्रवेश आदि को समाप्त करने के लिए मनुस्मृति दहन , मन्हाद सत्याग्रह , नाशिक सत्याग्रह आदि आंदोलन चलाये ।
भीमराव अंबेडकर को बड़ौदा सरकार ने अपने राज्य में रक्षामंत्री बना दिया, लेकिन यहां भी जातिगत भेदभाव और छुआछूत की बीमारी ने उनका पीछा नही छोड़ा और उन्हें कई बार अपमानजनक स्थिति का सामना करना पड़ा । लेकिन उन्होंने लंबे समय तक यहाँ काम नही किया क्योंकि उन्हें उनकी प्रतिभा के लिए बड़ौदा राज्य छात्रवृत्ति से सम्मानित किया गया था ।
जिससे उन्हें कोलंबिया विश्वविद्यालय से जो न्यूयार्क शहर में है से पोस्टग्रेजुएशन की डिग्री हासिल करने का मौका मिला । 1915 में भीमराव अंबेडकर जी ने कोलंबिया विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र , मानव विज्ञान , समाज शास्त्र इतिहास के साथ अर्थशास्त्र में MA की डिग्री हासिल की इसके बाद उन्होंने वाणिज्य और प्राचीन भारत पर शोध की थी।
1916 में कोलंबिया विश्वविद्यालय से ही उन्होंने पीएच.डी की उपाधि प्राप्त की , उनके इस शोध का विषय “ब्रिटिश भारत मे प्रातीय वित्त का विकेंद्रीकरण” था। लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स एंड पोलिटिकल साइंस – जब भीमराव अंबेडकर अपना फेलोशिप पूरा करके ब्रिटेन होते हुए भारत लौट रहे थे तभी वह उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स एंड पोलिटिकल साइंस में D.SC और M.SC और विधि संस्थान में बार- एट-लॉ की उपाधि के लिए अपना रजिस्ट्रेशन करवाया और फिर भारत लौटे ।
भारत लौटने पर उन्होंने सबसे पहले छात्रवृत्ति की शर्त के अनुसार बड़ौदा के नरेश के दरबार मे सैनिक अधिकारी और वित्तीय सलाहकार का पद मंजूर किया ।उन्होंने राज्य के रक्षा सचिव के रूप में काम किया । ये सब बाबा साहब भीमराव के लिए बहुत ही मुश्किलों भरा और बहुत ही संघर्षपूर्ण था क्योंकि छुआछूत और जातिगत भेदभाव की वजह से उन्हें काफी दुःख सहन करना पड़ा उस पूरे शहर में उन्हें कोई भी अपना कमरा देने को तैयार नही था ।
कुछ समय बाद बाबा साहब ने सैन्य मंत्री की नौकरी छोड़कर एक प्राइवेट अध्यापक और अकाउंटेंट की नौकरी जॉइन कर लिया । यहाँ उन्होंने परामर्श व्ययसाय भी शुरू किया किन्तु यहाँ भी जातिगत भेदभाव और छुआछूत की बीमारी ने उनका पीछा नही छोड़ा और सामाजिक भेदभाव की वजह से उनका यह काम भी नही चल सका ।

अम्बेडकर जी लिखित पुस्तकें (Books written by Ambedkar)

समाज सुधारक होने के साथ- साथ अम्बेडकर जी लेखक भी थे, बाबा साहब के निजी पुस्तकालय में 50,000 से भी अधिक किताबें थी। और यह विश्व का सबसे बड़ा निजी पुस्तकालय है बाबा साहब अंबेडकर कुल 64 विषयों में मास्टर थे ,वे हिंदी ,संस्कृत ,पाली, फ्रेंच ,जर्मन, मराठी, अंग्रेजी, पार्शियन और गुजराती जैसे 9 भाषाओं के जानकार थे इसके अलावा उन्होंने लगभग 21 साल तक विश्व के सभी धर्मों के रूप से पढ़ाई की थी

इनकी प्रसिद्ध पुस्तकें निम्न है –

      1.  भगवान बुद्ध और उनका धर्म । 
      2. कांग्रेस और गाँधी ने अछूतों के लिए क्या किया ।
      3. शूद्र कौन और कैसे।
      4. रानाडे, गांधी और जिन्ना ।
      5. भारत में जातियाँ और उनका मशीनीकरण ।
      6. भारत का राष्ट्रीय अंश ।
      7. जाति विच्छेद ।
      8. पाकिस्तान पर विचार ।
      9. बहिष्कृत भारत (साप्ताहिक)।
      10. मूल नायक । 
      11. रूपए की समस्या 
      12. महाराष्ट्र भाषाई प्रांत उद्धव और समाधान 
      13. ब्रिटिश भारत में साम्राज्यवादी वित्त का विकेंद्रीकरण
      14. ब्रिटिश भारत में प्रांतीय वित्त का अभ्युदय
      15. संघ बनाम स्वतंत्रता
      16. जनता (साप्ताहिक)।

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राजनितिक जीवन (raajaneetik jeevan)

आज़ादी के बाद पंडित नेहरू के मंत्रिमंडल में डॉक्टर अम्बेडकर कानून मंत्री बने और नेहरू की पहल पर उन्होंने हिन्दू कोड बिल तैयार किया लेकिन इस बिल को लेकर भी उन्हें ज़बरदस्त विरोध झेलना पड़ा इस मुद्दे पर मतभेद इस कदर बढ़े की अम्बेडकर जी ने कानून मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया ।
हालांकि बाद में हिन्दू कोड बिल पास हुआ और इससे हिन्दू महिलाओं की स्थिति में काफी सुधार हुआ अम्बेडकर जी जब 1942 से लेकर 1946 तक के समय में लेबर इन दी वायसराय कॉउंसिल में सदस्य थे तब उन्होंने मजदूरों के उत्थान के लिए महत्वपूर्ण कार्य किया। बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने वर्ष 1936 में स्वतंत्र लेबर पार्टी की स्थापना की । इसके पश्चात 1937 में केंद्रीय विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी ने 15 सीटों से विजय हासिल किया ।
उसी वर्ष 1937 में बाबा साहब भीमराव अंबेडकर जी ने अपनी पुस्तक “द एनीहिलेशन आफ कॉस्ट” भी प्रकाशित की जिसमें उन्होंने हिंदू रूढ़िवादी नेताओं की कठोर निंदा की और देश में चल रही जाति व्यवस्था की भी कठोर निंदा की । 15 अगस्त 1947 में भारत अंग्रेजों के शासन से जैसे ही मुक्त हुआ वैसे ही उन्होंने अपनी राजनीतिक पार्टी ( स्वतंत्र लेबर पार्टी) को अखिल भारतीय अनुसूचित जाति संघ (ऑल इंडिया शेड्यूल )कास्ट पार्टी में बदल दिया। हालांकि अंबेडकर जी की पार्टी 1946 में हुए भारत के संविधान सभा के चुनाव में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाई थी।
उस समय समाज में दलित वर्गों को हरिजन नाम से जाना जाता था । उनको यह नाम बापू महात्मा गांधी ने और कांग्रेस ने मिलकर दिया था । इस नाम का मतलब होता है कि भगवान के लोग, लेकिन बाबा साहब भीमराव अंबेडकर को गांधी जी द्वारा दिया गया यह नाम बिल्कुल भी पसंद नहीं आया और उन्होंने इस नाम का जमकर विरोध किया । उन्होंने कहा समाज में निम्न जाति, दलित और निर्धन वर्ग के लोग भी इसी समाज का हिस्सा हैं और उनको भी अन्य जातियों की तरह समानता का अधिकार है और वे भी इस समाज में पूरे हक के साथ रह सकते हैं ।
इसके बाद बाबा साहब भीमराव अंबेडकर जी को वायसराय एग्जीक्यूटिव काउंसिल में रक्षा सलाहकार और श्रम मंत्री के पद पर नियुक्त किया गया । इस प्रकार अनेक मुश्किलों को सहते हुए और संघर्ष के द्वारा बाबा साहब भीमराव अंबेडकर आजाद भारत के पहले लॉ मिनिस्टर बने, निम्न वर्ग से संबंधित होने के बाद भी बाबा साहब का मंत्री बनना उनकी जीवन की किसी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं थी ।
स्वदेश लौटने पर उन्होंने देश के लिए लीगल प्रोफेशनल के रूप में काम करना शुरू कर दिया । 1920 में उन्होंने अपने जाति के लोगों के हितों की रक्षा में काम करने के लिए उचित कदम उठाना शुरू किया । उन्होंने बहुत से आंदोलन विरोधी रैलियां और भाषण आयोजित किए और लोगों को छुआछूत के खिलाफ आगे आने को प्रेरित किया । उन्होंने मनुस्मृति को जलाया जो कि जातिवाद का समर्थन करती थी ।
वर्ष 1924 में उन्होंने ऑपरेशन और छुआछूत को जड़ से समाप्त करने के इरादे के साथ बहिष्कृत हितकारिणी सभा की स्थापना की इस संस्था का मुख्य उद्देश्य पिछड़े वर्ग को शिक्षा उपलब्ध करवाना और सामाजिक आर्थिक प्रगति दिलाना था और समाज को उत्साहित ,शिक्षित और व्यवस्थित करना था इस तरह बाबा साहब लगातार संघर्ष करते हुए अपने विजय पथ पर अग्रसर होते गए । इस तरह 1925 में बाबा साहब भीमराव अंबेडकर को ऑल यूरोपियन साइमन कमीशन के अंतर्गत बॉम्बे प्रेसीडेंसी कमेटी में चुना गया कमीशन रिपोर्ट को कांग्रेस ने स्वीकार नहीं किया क्योंकि वह स्वतंत्र भारत के लिए अपना स्वयं का संविधान चाहती थी ।
बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने ना केवल स्वतंत्रता के पहले देश के गठन में मुख्य भूमिका निभाई बल्कि उनके विचारों और दूरदर्शिता का लाभ स्वतंत्रता के बाद भी कई वर्षों तक देश को मिला उन्होंने हमारे राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे में अशोक चक्र स्थापित करवाया । स्वतंत्रता के 45 वर्षों के बाद 2000 में मध्य प्रदेश और बिहार से छत्तीसगढ़ और झारखंड राज्यों के बनने के पीछे भी उनके द्वारा ही दिया गया सुझाव है ।

बौद्ध धर्म की ओर रुझान (bauddh dharm kee or rujhaan)

डॉक्टर भीमराव अंबेडकर वर्ष 1950 में श्रीलंका गए वहाँ उन्होंने एक बौद्धिक सम्मेलन में भाग लिया । वे बौद्ध धर्म के विचारों से इतने अधिक प्रभावित हुए की उन्होंने बौद्ध धर्म को अपनाने की ठान ली, बौद्ध धर्म अपनाने के पश्चात ये हिन्दू रीति रिवाजों और जाति विभाजन की घोर निंदा करने लगे । श्रीलंका से भारत लौटने के बाद उन्होंने बौद्ध धर्म के बारे में पुस्तक लिखी व अपने आपको इस धर्म में बदल लिया ।
14 अक्टूबर 1956 को अम्बेडकर जी ने एक आम सभा का आयोजन किया और उन्होंने अपने 5 लाख अनुयायियों को बौद्ध धर्म में परिवर्तित करवाया । वर्ष 1954 में बाबा साहब अंबेडकर ने म्यांमार का दो बार दौरा किया फिर रंगून में तीसरे विश्व बौद्ध फेलोशिप के सम्मेलन में भाग लेने के लिए गए । 1955 में उन्होंने बुद्धिस्ट सोसाइटी ऑफ इंडिया या भारतीय महासभा की स्थापना किया।
बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने नागपुर में 14 अक्टूबर 1956 को स्वयं और उनके समर्थकों के लिए एक औपचारिक सार्वजनिक समारोह का आयोजन किया ,बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने श्रीलंका के एक महान बौद्ध भिक्षु महंत वीर चंद्रमणि से पारंपरिक तरीके से त्रिरत्न ग्रहण की और पंचशील को स्वीकार करते हुए बौद्ध धर्म ग्रहण किया । इसके बाद उन्होंने पहले दिन लगभग 50,0000 समर्थकों को बौद्ध धर्म में परिवर्तित किया।
अंबेडकर जी और उनके अनुयायियों ने समतावादी हिंदू धर्म और हिंदू दर्शन की कठोर निंदा की। बाबा साहब ने दूसरे दिन 15 अक्टूबर को नागपुर में अपने 20,0000 अनुयायियों को काल धर्म की दीक्षा दी फिर तीसरे दिन 16 अक्टूबर को बाबा साहब चंद्रपुर गए और वहां उन्होंने अपने 30,0000 समर्थकों को बौद्ध धर्म की दीक्षा दी। इस तरह केवल 3 दिन में बाबा साहब ने अपने 10 लाख से अधिक समर्थकों को बौद्ध धर्म में रूपांतरित किया।।
इसके बाद बाबा साहब चौथी विश्व बौद्धिक सम्मेलन में भाग लेने के लिए काठमांडू गए , अपने इतने अनुयायियों को बौद्ध धर्म में परिवर्तित करने के पश्चात बाबा साहब ने उनके लिए बौद्ध धर्म से संबंधित 22 प्रतिज्ञाएं निर्धारित की। जो बौद्ध धर्म का सार या दर्शन है। इतने अधिक लोगों को बौद्ध धर्म में परिवर्तित करने के पश्चात यह पूरे विश्व में सुर्खियों में आ गया और चर्चा का विषय बन गया। उन्होंने अपने अनुयायियों के लिए बौद्ध धर्म से संबंधित प्रतिज्ञा इसलिए निर्धारित की ताकि वे हिंदू धर्म से पूर्ण रूप से मुक्त हो जाए ,उन प्रतिज्ञाओं में हिंदू धर्म में व्याप्त छुआछूत, जातिगत भेदभाव ,अंधविश्वास ,अर्थहीन रस्में, निर्धनों का शोषण आदि विचारों का खंडन किया गया ।
बाबा साहब अंबेडकर एक अछूत और निचली, महार जाति से सम्बंध रखते थे। हिंदू धर्म ग्रंथों का अध्ययन करने के पश्चात बाबा साहब अंबेडकर को यह ज्ञात हुआ कि हिंदू धर्म ग्रंथों में निम्न जातियों, दलितों और निर्धनों के प्रति भेदभाव की भावना है बाबा साहब को यह बिल्कुल भी उचित नहीं लगा।
उच्च जातियों का निर्धनों, दलितों और निम्न श्रेणी की जातियों पर किया जाने वाला शोषण और अमानवीय व्यवहार ही बाबा साहब के धर्म परिवर्तन का मुख्य कारण बना। वे मानते थे कि सिर्फ सामाजिक स्तर पर ही नहीं बल्कि कानूनी स्तर पर भी इस भेदभाव से निपटा जा सकता है। बाबा साहब भीमराव अंबेडकर अपने संपूर्ण जीवन भर जातिगत भेदभाव को समाप्त करने का प्रयास करते रहें और समाज में हिंदुओं को एकजुट करने का प्रयास करते रहे लेकिन, उनका यह प्रयास सफल ना होता हुआ देखकर उन्होंने अंत समय में बौद्ध धर्म अपना लिया ।।
बाबा साहब ने कहा कि मैं एक हिंदू जाति में पैदा जरूर हुआ हूं लेकिन मैं हिंदू रहकर मरना नहीं चाहता हूँ ।आज भी उनके विचार दलित वर्ग के लोगों को प्रेरित करते हैं ।। बाबा साहब भीमराव अंबेडकर का उपनाम सकपाल था।लेकिन समाज में निम्न जातियों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार से बचने के लिए उन्होंने अपने उपनाम को बदलकर अंबेडकर कर लिया । हालांकि कई लोगों का मानना था कि उनके गांव का नाम अंबेडकर होने के कारण उन्होंने अपना उपनाम अंबेडकर रख लिया।

सामाजिक उत्थान में योगदान (saamaajik utthaan mein yogadaan)

बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर जी ने भारतीय समाज में दलितों और नीची जाति के लोगों के हित में महत्वपूर्ण कार्य किया ।उन्होंने निम्न जाति , दलितों व जनजाति के लिए देश में एक अलग से चुनाव प्रणाली बनाया और उनको भी देश के चुनाव में हिस्सा लेने का पूरा हक दिया । अम्बेडकर जी ने इनके आरक्षण की भी बात रखी । इस प्रकार इनके योगदान से समाज में जनजाति ,दलितों व नीची जाति को समाज मे रहने के लिए एक विशेष स्थान प्राप्त हुआ ।
बाबा साहब भीमराव अंबेडकर स्वयं एक निम्न जाति(महार जाति ) से संबंध रखते थे । और इस कारण उनके परिवार को कई बार सामाजिक और आर्थिक भेदभाव का सामना करना पड़ा , महार जाति मुख्यतः महाराष्ट्र में मिलती है ,वहाँ लगभग 10% जनसंख्या महार जाति है।
बाबा साहब अंबेडकर ने 1927 में जातिगत भेदभाव और छुआछूत के खिलाफ बहुत से सक्रिय अभियान शुरू किये और अपना पूरा समय इसी लक्ष्य को प्राप्त करने में लगा दिए । उस समाज में निर्धनों , निम्न जाति के लोगों और दलितों के विरुद्ध शोषण व उनकी विपरीत स्थितियों को देखकर बाबा साहब के मन में बहुत ही आक्रोश था ।लेकिन उन्होंने कभी भी हिंसा के रास्ते का चुनाव नहीं किया । वे हमेशा अहिंसा के रास्ते पर चलें ।
सत्याग्रह अभियान के तहत उन्होंने छुआछूत ,जातिगत भेदभाव आदि सामाजिक कुरीतियों का जमकर विरोध किया । बाबा साहब ने महाराष्ट्र के महाद में एक सत्याग्रह शुरू किया जिसे महाद सत्याग्रह के नाम से जाना जाता है। यह सत्याग्रह गांधी जी के दांडी मार्च के भी 3 साल पूर्व शुरू हुआ था। निम्न जाति के लोगों को पीने का पानी उपलब्ध हो सके ,यह सत्याग्रह का मुख्य मकसद था।
सत्याग्रह का मुख्य उद्देश्य यही था कि समाज में निर्धनों, दलितों और निम्न जाति के लोगों को भी समानता का अधिकार प्राप्त हो सके बाबा साहब अंबेडकर अहिंसा पूर्वक आंदोलन करते हुए सन 1930 में चंद्रचूड़ लोगों के साथ कालाराम मंदिर गए । इस तरह उनकी लोकप्रियता काफी बढ़ रही थी और 1932 में लंदन में सेकंड राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस निमंत्रण मिला
अंबेडकर जी का यह मानना था कि निर्धनों ,अछूतों और दलित वर्ग के लोगों को न्याय तभी मिल सकता है जब उन्हें पृथक मतदाता बनाया जाए अंग्रेज भी उनकी पृथक मतदाताओं की बात पर सहमत हो गए । लेकिन महात्मा गांधी ने इस विचार का विरोध किया। गांधीजी के उपवास शुरू करने पर हिंदू समाज में अस्थिरता की स्थिति उत्पन्न हो गई और बाबा साहब कट्टर हिंदू और दलित वर्ग , दो वर्गों में हिंदुओं के विभाजन को देखते हुए गांधी जी की बात पर सहमत हुए और उन्होंने एक संधि की जिसे पूना पैक्ट कहा गया
जिसके अनुसार सेंट्रल काउंसिल ऑफ स्टेटस और क्षेत्रीय विधानसभा में स्पेशल इलेक्टोरेट के स्थान पर पिछड़े वर्ग को आरक्षण देने की बात मानी गई ।बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने 1920 में कलकापुर के महाराजा शाहजी द्वितीय की सहायता से मूकनायक सामाजिक पत्र की स्थापना की अंबेडकर जी के इस कार्य ने पूरे देश में सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में हलचल पैदा कर दी थी ।
इसके बाद भीमराव अंबेडकर काफी प्रसिद्ध हो गए बाबा साहब ने जातिगत भेदभाव का आरोप ब्राह्मणों पर लगाया और कई गैर ब्राह्मण नेताओं के लिए लड़ाई लड़ी और सफलता हासिल की , इन्हीं सफलताओं के दम उन्हें निर्धनों ,निम्न जाति के लोगों और दलितों के उत्थान के लिए लड़ाई लड़ने का आधार मिला।
बाबा साहब अंबेडकर की लोकप्रियता को देखते हुए उन्हें वर्ष 1932 में लंदन के गोलमेज सम्मेलन में हिस्सा लेने का निमंत्रण भी मिला । हालांकि इस सम्मेलन में दलितों के मसीहा बाबा साहब भीमराव अंबेडकर जी ने महात्मा गांधी के विचारों का विरोध भी किया। जिन्होंने एक अलग मतदाता के खिलाफ आवाज उठाई थी जिसकी उन्हें दलितों के चुनाव में हिस्सा बनने की मांग की थी ।

भारतीय संविधान के निर्माता (bhaarateey sanvidhaan ke nirmaata)

बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर जी को संविधान गठन कमेटी का चेयरमैन बनाया गया । उन्होंने समानता, बंधुता, समता एवं मानवता आधारित भारतीय संविधान को 2 वर्ष 11 महीने और 17 दिन के कठिन परिश्रम से तैयार कर 26 नवंबर 1949 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद को सौंपकर देश के समस्त नागरिकों को राष्ट्रीय एकता, अखंडता और व्यक्ति की गरिमा की जीवन पद्धति से भारतीय संस्कृति को अभिभूत किया।।
संविधान के निर्माण का मुख्य उद्देश्य देश में छुआछूत और जातिगत भेदभाव को को जड़ से समाप्त करना था और एक छुआछूत मुक्त समाज का निर्माण कर समाज में क्रांति लाना था ,साथ ही सभी को समानता का अधिकार दिलाना था ताकि निर्धन ,दलित और निम्न जाति के लोग भी अपना जीवन सुदृढ़ रूप से व्यतीत कर सके और उनको भी समाज में जीने के लिए समानता का अधिकार प्राप्त हो सके ।
बाबा साहब को 29 अगस्त 1947 को संविधान के मसौदा समिति के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया उन्होंने समाज के सभी वर्गों के बीच एक वास्तविक पुल के निर्माण पर जोर दिया, उनके अनुसार अगर देश के भिन्न-भिन्न वर्गों के अंतर को समाप्त नहीं किया गया तो देश की अखंडता और एकता को बनाए रखना असंभव होगा।
इसके साथ ही उन्होंने लिंग जाति और धार्मिक समानता पर भी खासा जोर दिया वर्ष 1951 में महिला सशक्तिकरण का हिंदू संहिता विधेयक पारित करवाने में प्रयास किया और पारित न होने पर स्वतंत्र भारत के प्रथम कानून मंत्री पद को छोड़ दिया ।उन्होंने योजना आयोग ,वित्त आयोग ,निर्वाचन आयोग ,महिला पुरुष के लिए समान नागरिक संहिता, राज्य पुनर्गठन , बड़े आकार के राज्यों को छोटे आकार में संगठित करना, मानव अधिकार ,मौलिक अधिकार ,ऑडिटर जनरल ,निर्वाचन आयोग, राजनीतिक ढांचे को मजबूत बनाने वाली सशक्त आर्थिक, शैक्षणिक ,सामाजिक एवं विदेश नीति बनाई ।
प्रजातंत्र को सशक्त बनाने के लिए राज्य के तीनों अंगों विधायिका, न्यायपालिका एवं कार्यपालिका को स्वतंत्र और पृथक बनाया तथा समान नागरिक अधिकार के स्वरुप एक व्यक्ति, एक मत और एक मूल्य के तत्व को स्थापित किया ।कार्यपालिका ,विधायिका एवं न्यायपालिका में जनजाति एवं अनुसूचित जाति के लोगों की सहभागिता संविधान द्वारा सुनिश्चित की तथा भविष्य में की किसी भी प्रकार की विधायिका जैसे जिला पंचायत ,राज ग्राम पंचायत आदि में सहभागिता का मार्ग प्रशस्त किया । बाबा साहब अंबेडकर जी द्वारा तैयार किए गए संविधान पाठ में देश के नागरिकों को एक व्यापक श्रेणी की आर्थिक स्वतंत्रता की सुरक्षा प्रदान की गयी जिनमें दलित ,निर्धन और निम्न श्रेणी के लोगों के विरुद्ध समाज में फैले भेदभाव छुआछूत आदि सभी प्रकार की सामाजिक बुराइयों को गैरकानूनी करार दिया गया ।।
बाबा साहब ने महिलाओं के लिए भी धारा 370 ,सामाजिक और आर्थिक अधिकारों की वकालत की । अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जाति के लोगों के लिए स्कूलों ,कालेजों ,सिविल सेवाओं और नौकरियों आदि में आरक्षण शुरू करने लिए सभा का समर्थन भी हासिल किया। बाबा साहब के इस सकारात्मक कार्य से भारत के विधि निर्माताओं ने दलित और निम्न जाति के श्रेणी के लोगों के लिए सामाजिक और आर्थिक असमानताओं के उन्मूलन और उन्हें हर क्षेत्र में अवसर प्रदान करने की सोची । अंबेडकर जी द्वारा तैयार किया गया संविधान एक लचीली प्रवृत्ति का था और साथ ही बहुत ही मजबूत था, यह इस प्रकार से निर्मित किया गया था ताकि शांति और युद्ध दोनों के समय समाज में लोगों को जोड़ कर रख सकें ।
बाबा साहब ने कहा कि अगर कुछ भी गलत हुआ तो इसका कारण यह नहीं होगा कि हमारा संविधान बुरा था बल्कि संविधान का उपयोग करने वाले लोग इसका उचित तरीके से उपयोग नहीं कर सके। वर्ष 1991 में संसद में बाबा साहब के हिंदू कोड बिल के मसौदे को पारित नहीं किया गया। इसके बाद बाबा साहब ने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया इस मसौदे में उत्तराधिकार अर्थव्यवस्था और विवाह के कानूनों में लैंगिक समानता की मांग की गई थी हालांकि कुछ महान नेताओं जैसे प्रधानमंत्री नेहरू ,कैबिनेट और अन्य कई कांग्रेसी नेताओं ने इस पर सहमति जताई पर संसद सदस्यों के अधिकांश लोग इसके विरुद्ध थे।

उपलब्धियाँ (Achievements)

बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के पास 32 डिग्रियां थी और वे 9 भाषाओं के जानकार थे । अम्बेडकर जी को आज़ादी के बाद संविधान निर्माण के लिए 29 अगस्त 1947 को संविधान की प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनाया गया फिर उनकी अध्यक्षता में 2 वर्ष 11 माह 18 दिन के बाद संविधान बनकर तैयार हुआ ।
पीएचडी की कई मानक उपाधियाँ मिली थी । उन्हें मरणोपरान्त भारत रत्न और भारत सर्वोच्च नागरिक सम्मान से सम्मानित किया गया। भीमराव जी ने समाज मे अछूतों , नीची जाति के लोगों , दलितों और निर्धनों की स्थिति का गहराई से विश्लेषण किया तो उन्होंने पाया कि समाज में इन लोगो की स्थिति बहुत ही दयनीय है इसी उद्देश्य से उन्होंने संविधान का निर्माण किया जिससे समाज में निम्न श्रेणी के लोगो के प्रति छुआछूत की भावना और जातिगत भेदभाव को जड़ से खत्म किया जा सके और एक ऐसे समाज का निर्माण किया जा सके जिससे कोई भी किसी से भेदभाव न करे और सभी को समानता से जीने का अधिकार प्राप्त हो सके ।
बाबा साहब के इस कदम से समाज में दलितों , निर्धनों , और निम्न श्रेणी के लोगो के जीवन मे एक क्रांति सी आ गयी और इन लोगो को भी समाज में जीने के लिए समानता और सम्मान का अधिकार प्राप्त हो सका । भीमराव अंबेडकर जी को 29 अगस्त , 1947 को संविधान के मसौदा समिति के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया ।
अम्बेडककर जी ने सभी श्रेणी के लोगो के मध्य एक वास्तविक पुल के निर्माण पर ज़ोर दिया । भीमराव अंबेडकर के मुताबिक अगर समाज में छूआछूत , जातिगत भेदभाव , अलग -अलग वर्गों के मध्य अंतर को समाप्त नहीं किया गया तो सभी लोगों के मध्य एकता बनाये रखना मुश्किल होगा, इसके साथ ही उन्होंने जति, लिंग और धार्मिक समानता पर काफी हद तक जोर दिया। बाबा साहब ने सरकारी नौकरियों , शिक्षा और सिविल सेवाओं में अनुसूचित जनजातियों और अनुसूचित जातियों के सदस्यों के लिए आरक्षण शुरू करने के लिए विधानसभा का समर्थन हासिल करने में भी सफल हुए।
भारत रत्न भीमराव अंबेडकर ने अपनी जिंदगी के 65 सालों में देश को शैक्षणिक , धार्मिक , सामाजिक, आर्थिक , राजनीतिक , ऐतिहासिक , सांस्कृतिक , साहित्यिक ,औद्योगिक , संवैधानिक समेत अलग -अलग क्षेत्रों में कई नैतिक कार्य करके देश के निर्माण में अहम योगदान दिया ।
भीमराव अंबेडकर एक न्यायवादी , समाज सुधारक और प्रखर राजनेता के रूप में जाने जाते हैं। देश मे एक प्रसिद्ध राजनेता के रुप में जातिगत भेदभाव , अपृश्यता और अनेक सामाजिक कुरीतियों को समाप्त करने के उनके प्रयास उल्लेखनीय थे । उन्होंने अपना पूरा जीवन दलितों , निम्न जाति के लोगों और निर्धनों को मजबूत बनाने और उनके अधिकारों की रक्षा करने में लगा दिया । बाबा साहब अम्बेडकर की पहचान न केवल एक कानून मंत्री के रूप में है वरन वे एक स्वतंत्र सेनानी और भारत के महापुरुष भी थे । उन्होंने कमजोर और निम्न जाति के लोगो के बीच फैली निर्धनता , अशिक्षा और अन्य समस्याओं को कम किया और उनके लिए सामाजिक अधिकारों और उनके हितों की रक्षा की ।
बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने 1927 में छुआछूत के खिलाफ बहुत से सक्रिय अभियान शुरू किये , और अपना पूरा समय इसी लक्ष्य को देने लगे । समाज मे दलितों की बुरी स्थिति और असमानता को देखते हुए उनके मन मे बहुत आक्रोश था पर फिर भी इस आक्रोश को उन्होंने अपने मन मे ही रखा और अहिंसा का रास्ता न अपनाते हुए उन्होंने गांधी जी के मार्ग हिंसा को अपना हथियार बनाया और सत्याग्रह अभियान के तहत छूआछूत के अधिकार , जल स्रोत से पानी लेने और मंदिरों में घुसने की आज़ादी देने की वकालत की । बाबा साहब अम्बेडकर ने महाराष्ट्र के मन्हाद में एक सत्याग्रह शुरू किया जिसे महद सत्याग्रह के नाम से जाना जाता है यह सत्याग्रह बापू गांधी जी के दांडी मार्च के भी 3 साल पहले हुआ था । यह सत्याग्रह इसलिए आरम्भ किया गया ताकि दलित वर्ग के लोगो को स्वतंत्र रूप से पानी मुहैया हो सके ।
बाबा साहब ने कुछ दलित लोगो के साथ महद के चवदार झील में पानी पिया था । इस झील में पहले दलितों और निम्न जातियों को पानी पीने की अनुमति नही थी । उन्होंने कहा कि हम भी इंसान है इसलिए समानता का अधिकार सब पर लागू होना चाहिए , इस सत्याग्रह का मुख्य उद्देश्य यही था कि सभी वर्ग के लोगों को समानता का अधिकार प्राप्त हो सके । बाबा साहब 1930 में 15000 अछूत लोगों के साथ अहिंसा पूर्वक आंदोलन करते हुए कालाराम मंदिर गए । बाबा साहब को दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के संविधान को तैयार करने में 2 साल और 11 महीने का समय लगा , उन्हें भारतीय संविधान का जनक भी कहा जाता है । भारत मे बहुद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं के जनक माने जाने वाले बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने दामोदर घाटी परियोजना , सोन नदी घाटी परियोजना , हीराकुंड बांध परियोजना और भांखडा नांगल बांध परियोजना की शुरुआत की । उन्होंने राज्य स्तर और केंद्र स्तर दोनों में सिंचाई परियोजनाओं के विकास की सुविधा के लिए केंद्रीय जल आयोग का भी गठन किया। संविधान निर्माण के अलावा उन्होंने भारत के वित्त आयोग की स्थापना में भी सहायता की । उन्होंने अपनी नीतियों के माध्यम से देश की सामाजिक , आर्थिक और धार्मिक स्थिति में परिवर्तन किया ।
इसके साथ ही उन्होंने स्थिर अर्थव्यवस्था के साथ मुक्त अर्थव्यवस्था पर भी जोर दिया । वे लगातार महिलाओं की स्थिति में भी सुधार लाने की प्रक्रिया में लगे रहे । बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने सन 1951 में , महिला सशक्तिकरण हिन्दू संहिता विधेयक पारित करवाने की भी कोशिश मे की और इसके पारित नही होने पर उन्होंने स्वतंत्र भारत के प्रथम कानून मंत्री के पद को त्याग दिया। इसके बाद बाबा साहब भीमराव अंबेडकर जी ने लोकसभा में सीट के लिए चुनाव भी लड़ा लेकिन वे इस चुनाव में विजय हासिल नही कर सके ।बाद में उन्हें राज्यसभा में नियुक्त किया गया । बाबा साहब जी ने वित्त आयोग , निर्वाचन आयोग , योजना आयोग ,महिला पुरुष के लिए समान नागरिक हिन्दू संहिता , राज्य पुनर्गठन , बड़े आकार के राज्यो को छोटे आकार में संगठित करने , मौलिक अधिकार , राज्य के नीति निर्देशक तत्व , मानवाधिकार , ऑडिटर जनरल , निर्वाचन आयुक्त , शैक्षणिक , आर्थिक और सामाजिक आदि नतियाँ बनाई।

अम्बेडकर जी के सुविचार (ambedakar jee ke suvichaar)

दलितों और अछूतों के मसीहा कहे जाने वाले बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने भारत की सभ्यता व संस्कृत में परिवर्तन के अलावा सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से भी अमूल्य परिवर्तन किया, उन्होंने समानता के अधिकार को संविधान में स्थान देकर भारत के सामाजिक विकास के एक नए युग की शुरुआत की । उनके सुविचार निम्नलिखित है

    1. मनुष्य संघर्ष के द्वारा जो कुछ भी प्राप्त करता है उस से बढ़कर इस दुनिया में कुछ भी नहीं है ।
    2. यदि मैंने देखा कि संविधान का उचित उपयोग नहीं हो रहा है तो, मैं ही वह व्यक्ति हूं जो इसे नष्ट कर देगा ।
    3. जीवन लंबा नहीं, महान होना चाहिए ।
    4. मैं उसी धर्म का अनुयायी हूँ जो हमें समानता, स्वतंत्रता और आपस में भाईचारा रखना सिखाता है ।
    5. हमारे समाज की समस्या यह नहीं है कि हमारे समाज में अनपढ़ लोग हैं, समस्या यह है कि समाज के पढ़े-लिखे लोग भी गलत बातों का समर्थन करने लगते है ,और गलत को सही दिखाने के लिए अपने बुद्धि का उपयोग करते हैं।
    6. अपनी क्षमता और कर्म पर विश्वास करो भाग्य में नहीं ।
    7. इतिहास लिखने वाला इतिहासकार निष्पक्ष, सटीक और ईमानदार होना चाहिए
    8. मनुष्य का जीवन स्वतंत्र है वह समाज के विकास के लिए ही नहीं अपितु स्वयं के विकास के लिए जन्म लिया है ।
    9. संघर्ष करें , शिक्षित बने और एकजुट रहें ।
    10. आप खुद को दलित इसलिए मानते हैं क्योंकि दूसरे लोगों को आप उच्च मानते हैं , वास्तव में वही लोग पूर्ण रूप से स्वतन्त्र हैं जो मन से स्वतंत्र है ।
    11. हमारे संविधान में जनता की सबसे बड़ी ताकत मताधिकार ।
    12. मनुष्य के जीवन जीने का आधार ज्ञान है ।
    13. न्याय हमेशा समानता के विचार को जन्म देती है ।
    14. संविधान हमारे जीवन जीने का आधार है ।
    15. शिक्षा पर पुरुषों और महिलाओं का समान अधिकार है ।

महाड़ सत्याग्रह (mahaad satyaagrah)

यह सत्याग्रह बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के नेतृत्व में 20 मार्च 1927 को रायगढ़ जिले में जो कि महाराष्ट्र राज्य में स्थित है ,में किया गया । निर्धनों ,दलितों और निम्न जाति के लोगों को महाड़ में स्थित चवदार तालाब से पानी पीने का अधिकार दिलाने के लिए बाबा साहब अंबेडकर द्वारा किया गया यह एक प्रभावी सत्याग्रह था। इस दिन को हमारे देश में सामाजिक सशक्तिकरण दिवस के रूप में मनाया जाता है ।
इस सत्याग्रह में हजारों की संख्या में निम्न जाति के लोगों , निर्धनों और दलितों को शामिल करते हुए बाबा साहब भीमराव अंबेडकर स्वयं महाड़ के चवदार तालाब पहुंचे और उस तालाब का पानी पिया और अपने अनुयायियों का अनुकरण किया। यह बाबा भीमराव अंबेडकर का प्रथम सत्याग्रह था ।
सभी उच्च जाति के लोग उस तालाब से पानी पी सकते थे ,लेकिन निर्धनों, निम्न जातियों और अछूतों का उस तालाब से पानी पीने का अधिकार नहीं था। इस अव्यवस्था के विरोध में बाबा साहब ने क्रांति की पहली शुरुआत की इस सत्याग्रह का एक उद्देश्य यह भी था कि निर्धन, दलित और निम्न जाति के लोग भी मंदिर में भगवान के दर्शन कर सकें।
उस समय समाज में दलितों और निर्धनों के प्रति विपरीत स्थितियों और असमानताओं को देखकर बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के मन में बहुत आक्रोश था ,लेकिन इन सब से निपटने के लिए उन्होंने हिंसा का मार्ग न अपनाते हुए वे गांधीजी के अहिंसा के मार्ग को अपनाएं । महाड़ सत्याग्रह गांधी जी की दांडी मार्च के भी 3 साल पहले हुआ था।
बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के इस महान सत्याग्रह से निर्धनों,दलितों व निम्न जाति के लोगों के जीवन में भी एक क्रांति सी आ गयी और उन्हें भी समानता का अधिकार मिल सका जिससे वह भी अपना जीवन सुचारू रूप से व्यतीत कर सकें । अतः कहा जा सकता है कि बाबा साहब भीमराव अंबेडकर दलितों व निर्धनों के मसीहा थें ।

पूणे समझौता (pune samajhauta)

महात्मा गाँधी और डॉक्टर बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के बीच पुणे की यरवदा सेंट्रल जेल में 24 सितंबर 1932 को पूना समझौता हुआ था जिसे पूना पैक्ट भी कहा जाता है । पूना समझौता वह था जिसने एक बड़े शोषित वर्ग को प्रभावित किया। बाबा साहब भीमराव अंबेडकर गोलमेज सम्मेलन से जो अधिकार निर्धनों, अछूतों और निम्न जातियों के लिए लेकर आए थे
गांधीजी ने उन अधिकारों को स्वीकार नहीं किया और उनके खिलाफ भूख हड़ताल कर दी और इन अधिकारों को रद्द करने का प्रस्ताव रखा।
गोलमेज सम्मेलन के अनुसार निर्धनों ,अछूतों और निम्न जातियों को अलग से निर्वाचन के साथ और कई भी अधिकार दिए गए थे। ब्रिटिश सरकार ने इस समझौते को मैकडोनाल्ड अवार्ड में संशोधन के रूप में अपनी सहमति प्रदान की थी, लेकिन पूना समझौते में अछूत वर्ग के लिए पृथक निर्वाचक मंडल को स्वीकार नहीं किया गया और इसे रद्द कर दिया गया और गांधीजी ने अपने सहमति पर यह समझौता किया की अछूत वर्ग के लिए आरक्षित सीटों की संख्या प्रांतीय विधान मंडलों में 71 से बढ़कर 147 और केंद्रीय विधायिका में कुल सीटों की संख्या 18 % कर दिया जाए ।
बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने मैकडोनाल्ड अवार्ड की घोषणा में अंग्रेजों के सामने अछूतों की हालत और उनके साथ होने वाले दुर्व्यवहार को बयां करते हुए उनके लिए राजनैतिक प्रतिनिधित्व की मांग रखी। बाबा साहब ने अंग्रेजों के सामने छुआछूत, भेदभाव आदि बीमारियों का जिक्र करते हुए अपने मजबूत पक्षों को रखा जिसके उपरांत काफी विश्लेषण करने के बाद अंग्रेजों ने अछूतों और दलितों को दो वोटों का अधिकार दिया जिसमें एक वोट से अछूत अपना प्रतिनिधि चुन सकते थे, और दूसरे वोट से वे सामान्य वर्ग का प्रतिनिधि चुन सकते थे इसमें अछूतों का प्रतिनिधि केवल अछूतों के वोट से ही चुना जाना था और उनके प्रतिनिधि चुनने में सवर्णों का किसी भी तरह का हस्तक्षेप नहीं था लेकिन अछूत अपने दूसरे वोट से सवर्णों का प्रतिनिधि चुन सकते थे।
दो वोट का अधिकार अछूतों के लिए बहुत ही क्रांतिकारी था जिससे भारत के इतिहास में अछूतों को पहली बार नैतिक स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त हुआ । इधर बापू गांधी दलितों को दिए गए इन अधिकारों के विपक्ष में थे उनका मानना था कि इससे हिंदू समाज विभक्त हो जाएगा ,हालांकि महात्मा गांधी दलित वर्ग के लोगों के उत्थान के पक्ष में थे लेकिन वे दलितों के लिए विभक्त निर्वाचन क्षेत्र और उनके दो वोट के अधिकार के विरोधी थे
बापू को लगता था कि इससे अछूत हिंदू धर्म से विघटित हो जाएंगे । यह सब रोकने के लिए महात्मा गांधी ने अंग्रेजी शासन को कई पत्र लिखे, लेकिन उससे कोई बात नहीं बन सकी तो महात्मा गांधी ने पुणे की यरवदा जेल में आमरण अनशन शुरू कर दिया ,उन्होंने कहा कि अछूतों के अलग निर्वाचन के विरोध में अगर उन्हें अपनी जान भी देनी पड़े तो भी वह पीछे नहीं हटेंगे, बापू के इस व्यवहार से बाबा साहब भीमराव अंबेडकर काफी निराश थे ।
वह इसे अछूतों के उत्थान में मजबूत कदम मान रहे थे अंग्रेजों ने अछूत समाज को भिन्न-भिन्न समुदाय की पहचान देने की कोशिश की लेकिन पूना पैक्ट के बाद यह समाप्त हो गया। हालांकि अछूतों के बड़े नेताओं ने पूना पैक्ट का जमकर विरोध किया था। इधर गांधी जी अपने अनशन पर डटे रहे, इससे न खाने-पीने के कारण उनकी सेहत लगातार गिरती चली गई और अंबेडकर जी पर अछूतों के अधिकारियों से समझौता कर लेने का दबाव बढ़ने लगा और देश के कई हिस्सों में बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के खिलाफ जमकर विरोध प्रदर्शन होने लगा और उनके पुतले जलाए गए यहां तक कि सामान्य वर्ग के लोगों ने दलितों की झोपड़ियों को जला दिया। अंततः बाबा साहब 24 सितंबर 1932 को गांधी जी से मिलने पुणे की यरवदा जेल पहुंचे ,यहां बाबा साहब और महात्मा गांधी के बीच समझौता हुआ जिसे पूना पैक्ट कहा गया, कहा जाता है कि बाबा साहब बहुत निराश थे और उन्होंने रोते हुए पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर किया ।
इस समझौते के अनुसार दलितों के लिए अलग निर्वाचन और दो वोट का अधिकार समाप्त हो गया, इसके बदले दलितों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या प्रांतीय विधान मंडलों में 71 से बढ़ाकर 147 और केंद्रीय विधायिका में कुल सीटों की संख्या 18 % दी कर दी गई ।
अछूत समाज के कई बड़े नेताओं ने पूना पैक्ट का जमकर विरोध किया और बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशी राम ने भी पूना पैक्ट का जमकर विरोध किया, कांशीराम ने अपनी किताब में लिखा था कि पूना पैक्ट की वजह से ही दलित अपने सच्चे प्रतिनिधि को चुनने से वंचित रह गये और उन्हें हिंदुओं द्वारा नामित प्रतिनिधि को चुनने के लिए मजबूर कर दिया ।

भीमराव अंबेडकर जी के बारे में कुछ रोचक तथ्य (Some interesting facts about Bhimrao Ambedkar)

बाबा साहब भीमराव अंबेडकर एक मजबूत इच्छाशक्ति वाले परोपकारी इंसान थे, उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन दूसरों की सेवा में समर्पित कर दिया उनके बारे में निम्न रोचक तथ्य है-

    1. बाबा साहब विदेश जाकर अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट की उपाधि हासिल करने वाले पहले भारतीय थे ।
    2. वे भारतीय संविधान की धारा 370 जो जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देता है ,के खिलाफ थे ।
    3. बाबा साहब ने महिला परिश्रम, महिला कल्याण निधि और बल श्रम के योजनाओं की पहल की थी ।
    4. बाबा साहब ने 21 साल की उम्र में ही सभी धर्मों की पढ़ाई कर ली थी ।
    5. बाबा साहब ने ही हमारे राष्ट्रीय ध्वज में अशोक चक्र लगवाया था ।
    6. बाबा साहब की दूसरी पत्नी एक ब्राह्मण महिला थी जिनका नाम सविता था ।
    7. बाबा साहब पेशे से एक वकील थे वह 2 साल तक मुम्बई के सरकारी लॉ कॉलेज में प्रिंसिपल के पद पर कार्यरत थे ।
    8. बाबा साहब 1954 में डायबिटीज नामक घातक बीमारी से ग्रसित हो गए थे ।
    9. श्रमिकों को कारखानों में 12 से 14 घंटे का कठिन परिश्रम करना पड़ता था परंतु इस नियम को बाबा साहब ने बदला और उनके कार्य समय को केवल 8 घंटे कर दिया
    10. भारतीय संविधान के निर्माण के लिए 29 अगस्त 1947 को बाबा साहब भीमराव अंबेडकर को संविधान की मसौदा समिति के अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया गया उन्होंने 1952 और 1954 में दो बार चुनाव लड़ा पर दोनों बार शिकस्त खा गए उन्होंने महिला अधिकारों और हिंदू कोड बिल मसौदे को रोके जाने के बाद कानून मंत्री का पद त्याग दिया। इस मसौदे में विवाह उत्तराधिकारी और अर्थव्यवस्था के कानूनों में लैंगिक समानता की बात कही गई थी।
    11. बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने दो विवाह किया था ,अपनी पहली पत्नी रमाबाई के निधन के बाद उन्होंने एक ब्राह्मण महिला सविता से दूसरा विवाह कर लिया
    12. हमारे देश में इम्प्लॉयमेंट एक्सचेंज जैसी व्यवस्था को आरंभ करने का श्रेय भी बाबा साहब भीमराव अंबेडकर को जाता है
    13. बाबा साहब भीमराव अंबेडकर की रुचि पहले सिख धर्म में थी परंतु बाद में उन्होंने बौद्ध धर्म को अपना लिया
    14. ” वेटिंग फॉर वीजा “जोकि अंबेडकर जी की जीवनी है, को कोलंबिया यूनिवर्सिटी में बतौर टेक्स्ट बुक पढ़ाई गई इसके अलावा जातिगत भेदभाव को मिटाने के लिए उनके द्वारा तैयार की गई अनडिलीवर्ड स्पीचेस के संकलन को ” ANNHILATION OF CASTE ” नामक पुस्तक में स्वयं प्रकाशित किया गया(फ ) बाबा साहब भीमराव अंबेडकर प्रथम भारतीय थे, जिन्होंने लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से डॉक्टरेट डिग्री हासिल की उन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय में भी पढ़ाई की, कानून और विदेश राजनीति शास्त्र की पढ़ाई करने वाले बाबा साहब अंबेडकर की पढ़ाई का पूरा खर्च बड़ौदा के नरेश ने वहन किया
    15. दलितों के मसीहा बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने दलित बौद्ध आंदोलन को प्रेरित किया और दलितों के प्रति सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध अभियान चलाया।
    16. बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर एलफिंस्टन कॉलेज में वर्ष 1908 में प्रवेश लिया ,इस कॉलेज में प्रवेश लेने वाले वे प्रथम दलित थे।(य ) एम.ए . की डिग्री उन्हें 1921 में लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से प्राप्त हुई(र ) बॉम्बे प्रेसीडेंसी समिति ने बाबा साहब भीमराव अंबेडकर को 1925 में साइमन आयोग में काम करने के लिए नियुक्त किया इस आयोग का विरोध पूरे भारत में किया गया
    17. बाबा साहब भीमराव अंबेडकर दलित वर्ग पर हो रहे शोषण के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए मूकनायक जनता और बहिष्कृत भारत नाम के पक्षी कौर सप्ताहिक पत्र निकालना आरंभ किये ।
    18. बाबा साहब भीमराव अंबेडकर का विवाह बहुत ही कम उम्र में ही कर दिया गया, उनका विवाह 9 साल की लड़की रमाबाई से हुआ।

निधन व सम्मान (Death and honor)

निधन (Death)

डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर जी को वर्ष 1954-55 के दौरान मधुमेह, नेत्र दृष्टि का कमजोर हो जाना व अन्य कई गंभीर बीमारियों ने जकड़ लिया इससे वह बीमार रहने लगे और 6 दिसंबर 1956 को अपने घर दिल्ली में स्वर्ग सिधार गए ।
क्योंकि बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने बौद्ध धर्म अपनाया था इसलिए बौद्ध धर्म के रीति-रिवाजों से उनका अंतिम संस्कार किया गया । उनके अंतिम संस्कार में लाखों कार्यकर्ताओं ,प्रशंसकों और समर्थकों ने भाग लिया। भारत के ऐसे महान समाज सुधाकर व दलितों के मसीहा हमारे दिलों में हमेशा जीवित रहेंगे ।
अपनी अंतिम पांडुलिपि बुद्ध और धम्म को पूरा करने के 3 दिन बाद उनकी मृत्यु हुई, बाबा साहब की मृत्यु के बाद उनकी दूसरी पत्नी सविता अंबेडकर जिनका नाम विवाह से पूर्व डॉ शारदा कबीर था ,जन्म से ब्राह्मण थीं । पर उनके साथ -साथ वह भी अपने धर्म को परिवर्तित कर बुद्ध बन गई थी ।
डॉक्टर सविता अंबेडकर की मृत्यु एक बौद्ध के रूप में वर्ष 2002 में हुई। बाबा साहब अम्बेडकर के सम्मान में कई सार्वजनिक संस्थानों का नाम उनके नाम पर रखा गया जैसे आंध्र प्रदेश और हैदराबाद का डॉक्टर अंबेडकर मुक्त विश्वविद्यालय, डॉक्टर भीमराव अंबेडकर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा जो कि नागपुर में है यह पहले सोनेगांव हवाई अड्डे के नाम से प्रचलित था, बी आर अंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय मुजफ्फरपुर, बाबा साहब का एक बड़ा आधिकारिक चित्र भारतीय संसद भवन में प्रदर्शित किया गया है ।
बाबा साहब भीमराव अंबेडकर को सम्मान देने के लिए उनकी याद में प्रत्येक वर्ष 14 अप्रैल को त्यौहार के रूप में भारत समेत पूरी दुनिया में मनाया जाता है ।।
बाबा साहब का समाधि स्थल “चैत्य भूमि” मुंबई मैं है । बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के जन्मदिवस पर हर साल उनके लाखों अनुयायी उनके जन्म स्थल भीम जन्मभूमि महू, बौद्ध धम्म दीक्षा स्थल ,दीक्षाभूमि नागपुर ,उनका समाधि स्थल चैत्य भूमि मुंबई ,जैसे कई स्थानों पर उन्हें अभिवादन देने के लिए एकजुट होते हैं । स्कूलों, कालेजों और सरकारी दफ्तरों में भी जयंती मना कर उन्हें नमन् किया जाता है।

मरणोपरांत सम्मान (Posthumous honor)

बाबा साहब भीमराव अंबेडकर को वर्ष 1990 में मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान “भारत रत्न” से सम्मानित किया गया। इस पुरस्कार को उनकी धर्मपत्नी सविता अंबेडकर ने उनके 99 जन्मदिवस के अवसर पर तत्कालीन राष्ट्रपति रामास्वामी वेंकटरमण द्वारा, 14 अप्रैल 1990 को ग्रहण किया। यह सम्मान उन्हें राष्ट्रपति भवन के अशोक हॉल में दिया गया ।
अम्बेडकर जयंती पर सार्वजनिक अवकाश रखा जाता है । इनका एक बड़ा आधिकारिक चित्र भारतीय संसद भवन में प्रदर्शित किया गया है । डॉक्टर बाबा साहब हवाई अड्डा नागपुर में है जो पहले सोनेगांव हवाई अड्डे के नाम से जाना जाता था ।

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